Saturday, July 22, 2017

निंदक नियरे राखिए, अड़ोसी-पड़ोसी बनवाए

अशोक मिश्र
अब क्या कहूं कबीरदास जी को। खुद तो जो कुछ भुगतना था, भुगता और चले गए। लेकिन दूसरे लोगों के लिए ऐसी मुसीबत खड़ी कर गए कि उससे जान छुड़ाना मुश्किल हो रहा है। वैसे अगर अपनी परेशानियों को ताख पर रखकर बात कहूं, तो बड़े भले आदमी थे कबीरदास जी। पोंगापंथियों को बिन पानी, डिटरजेंट बिना ऐसा धोया कि पढ़-सुनकर मजा आ जाता है। लेकिन साहब! ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय’ जैसी बात नहीं कहते, तो उनका क्या बिगड़ जाता। कहा जाता है कि कबीरदास जिंदगी भर अपने निंदकों से परेशान रहे। सोचा, मैं जिंदगी भर परेशान रहा, तो दूसरे कैसे मौज में रहें। सो, लिख डाली निंदक को अपने िनकट रखने की बात। लोगों ने कबीरदास की इस बात को एकदम राजाज्ञा मानकर निंदा कर्म जो शुरू किया, तो वह आज तक अबाध गति से जारी है। उनकी बात से लोगों को जैसे निंदा कर्म का लाइसेंस ही मिल गया। निंदकों की एक ऐसी परंपरा पुष्पित-पल्लवित हो गई जिसमें कई ख्यात-विख्यात निंदाकर्मी आते हैं। इस तरह हम जैसों सीधे-सादे आदमियों के लिए तो वे बखद्दर बो गए।
मेरे अड़ोस में रहते हैं मुसद्दीलाल और पड़ोस में मतिमंद जी। मतिमंद उनका तखल्लुस है। उनका असली नाम तो शायद उनकी बीवी भी नहीं जानती होगी। इन दोनों अड़ोसी और पड़ोसी को अपने मोहल्ले में मकान किराये पर दिलाकर मानो अपने निंदकों को आजू-बाजू में बसाने का पुनीत कार्य पूरा कर लिया हो। इन दोनों महानुभावों ने अपने आपको मेरा निंदक खुद नियुक्त किया और लग गए मेरा स्वभाव निर्मल करने में। मेरे चरित्र और कार्यों को बिना साबुन, पानी के इस तरह धोते हैं कि मानो मैं किसी गटर में जा गिरा उनका कुर्ता-पायजामा होऊं और वे गंदे कपड़ों को ड्राईक्लीन करने के विशेषज्ञ। पहले तो मैं उनके निंदक के पद पर स्वनियुक्त की बात समझ ही नहीं पाया। जब मोहल्ले की महिलाएं, लड़कियां और सज्जन-दुर्जन मुझसे बात करने से कतराने लगे, तो मेरे कान खड़े हुए।
कल तक मोहल्ले की महिलाएं आईटॉनिक प्रदान करने के िलए घंटों छज्जे पर, सड़क पर, घर के दरवाजे पर मौजूद रहती थीं। यह जानते हुए कि मैं उन्हें िनहारकर आईटॉनिक ग्रहण कर रहा हूं, वे मंडली जमाए रहती थीं, वे मुझे देखते ही झट से भीतर भागने लगीं, तो मैं परेशान हो गया। मैंने काफी कोशिश की, लेकिन कहीं से कोई सूत्र हाथ नहीं लगा। आज मोहल्ले की चक्की पर गेहूं पिसाने गया, तो छबीली से मुलाकात हो गई। छबीली मुझे देखकर पहले तो मुस्कुराई और फिर बोली, आजकल तो आपके पूरे मोहल्ले में बड़े चर्चे हैं। एक से बढ़कर एक किस्से-कहानियों के नायक बने हुए हो। फिर उसने ही मेरे अड़ोसी-पड़ोसी के निंदा कर्म का कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया। छबीली से असलियत जानकर मुझे बहुत गुस्सा आया। घर आकर घरैतिन से सलाह मशविरा करने के बाद मैंने फैसला किया कि उपयुक्त अवसर आने पर मैं अपने अड़ोसी-पड़ोसी की पूरे मोहल्ले के सामने कड़ी निंदा करूंगा। फिलहाल, घरैतिन को डैमेज कंट्रोल विंग का कार्यभार सौंंप दिया है। वे मेरी छवि सुधारने में लग गई हैं।

Tuesday, June 20, 2017

लौह पुरुष के अंतिम सपने का बिखर जाना

अशोक मिश्र
लौह पुरुष को रात भर नींद नहीं आई। उनकी पीड़ा का पारावार नहीं है। उन्हें आज पहली बार अपनी भलमनसाहत पर अफसोस हुआ। वट वृक्ष रूपी जो दल आज जब भारतीय राजनीति में अनंत शाखाएं फैलाए गर्वोन्नत खड़ा है, उसका बीजारोपण उन्होंने ही किया था। जब यह पौधा उगा था, तब लौह पुरुष और उनके एक अन्य साथी के रूप में दो ही पत्तियां इसमें थीं। लौहपुरुष और उनके साथी ने दल को अपनी जिजीविषा, मेहनत और कर्मठता के साथ धर्मवादी विचारधारा को सड़ा गलाकर खाद-पानी बनाया, उस वट वृक्ष को पुष्पित-पल्लवित किया। और उनका दुर्भाग्य देखिए कि एकाएक वट वृक्ष का माली ही बदल गया। उनकी प्रतिबद्धता और नीयत पर सवाल उठाए जाने लगे। नए माली ने पूरे बाग पर कब्जा कर लिया। यह वही माली था, जिसे कभी उसकी कारगुजारियों से नाराज होकर लौह पुरुष के साथी राजनीतिक वनवास दे देना चाहते थे। लेकिन यह लौह पुरुष ही थे, जो उसके सामने ढाल बनकर सामने खड़े हो गए थे।
उस माली ने बाग पर कब्जा करने के बाद सबसे पहले लौहपुरुष के पर कतरे। लौह पुरुष छटपटाकर रह गए। नए माली ने न केवल उन्हें बाग की चहारदीवारी से बाहर खदेड़ दिया, बल्कि उन्हें राजनीतिक वनवास ही दे दिया। लौह पुरुष को यह उम्मीद थी कि नया माली शायद उन्हें लौह पुरुष से शिखर पुरुष बना दे, लेकिन आज उनका यह अंतिम सपना भी टूटकर बिखर गया। वैसे सपने तो उनके कई टूटे, लेकिन यह सोचकर संतोष कर लिया, चलो..प्रधान नहीं बन पाए, तो क्या हुआ डिप्टी तो बन ही गए थे। लौहपुरुष की उपाधि तो जनता ने बड़े आदर-सम्मान के साथ दे ही दी। कहां सोचा था कि एक दिन इतिहास रचेंगे। इतिहास में नाम दर्ज हो जाएगा। नाम तो अब भी दर्ज होगा लौह पुरुष का, लेकिन हाशिये पर ढकेल दिए गए बेचारे पुरुष के तौर पर।


एक बहुत पुरानी कहावत है-जाके पैर न फटी बिंवाई, सो क्या जाने पीर पराई। लौह पुरुष का दर्द वही जान सकता है, जिसके सपने मुट्ठी से झरती रेत की तरह हाथ से निकल गए हों। भाग्य की विडंबना देखिए, जिस दल रूपी वट वृक्ष की रक्षा के लिए बेचारे लौह पुरुष जिंदगी भर कउआ हंकनी करते रहे, उसी दल के मालियों ने उन्हें यह सिला दिया। उनका आखिरी सपना भी बड़ी बेमुरौवत्ती से तोड़ दिया। आज लौह पुरुष को ठीक वैसे ही अफसोस हो रहा है, जैसे मुगल बादशाह औरंगजेब को अपनी जिंदगी की आखिरी रात में हजारों लोगों के कत्लेआम का पछतावा था। दल को खड़ा करने के लिए लौह पुरुष पूरे देश में यात्रा लेकर घूमे-फिरे, सोमनाथ तक गए। तब उम्र के हिसाब से भले ही पक्के यानी अधेड़ रहे हों, लेकिन उनका जोश और जुनून बिल्कुल कच्चा था। पूरे देश के भक्तों ने उनके इस कउआ हंकनी पर जोर-शोर से तालियां पीटी, बधाइयां दी थीं। पूरा देश लहालोट हो रहा था। उनके आगे-पीछे लोग बिछे जा रहे थे। वे जिधर मुंह उठाकर चल देते, हजारों-लाखों की भीड़ साथ चल पड़ती थी। ...और आज वह दिन है कि लौह पुरुष अपने कमरे में लेटे आंतरिक पीड़ा से कराह रहे हैं और कोई उनकी पीड़ा पर मरहम रखने वाला नहीं है।

Wednesday, June 14, 2017

‘हॉफ गर्लफ्रेंड’ के चक्कर में पिटे मुसद्दी लाल

अशोक मिश्र
आज सुबह पड़ोसी मुसद्दी लाल फटे और बदरंग भीगे जूते जैसा मुंह सुजाये मेरे घर में नमूदार हुए। वे किसी सड़क हादसे का शिकार हुए वाहन की तरह टूटे-फूटे दिख रहे थे। उनका नेशनल हाईवे जैसा सुदर्शनी चेहरा किसी गिट्टी युक्त कच्ची सड़क जैसा हो गया था। आंखों और गालों के पास की सूजन ठीक वैसे ही उभरी दिखाई दे रही थी, जैसे किसी ऊबड़खाबड़ सड़क के किनारे जगह-जगह नाली की गाद निकालकर सूखने के लिए कामचोर सफाई कर्मचारी ने रख दी हो। मैंने सहानुभूति जताते हुए कहा, ‘अरे भाई साहब..यह क्या हुआ? आपकी यह हालत कैसे हुई? कहीं आपने अपना स्कूटर कहीं ठोक तो नहीं दिया?’
मेरी बात सुनकर मुसद्दी लाल ने फेफड़े में गहरी सांस इस तरह खींची, मानो सारी पृथ्वी की हवा सोखकर ही मानेंगे। पहले तो वे थोड़ी देर तक अपने सूजे गाल को सहलाते रहे, जैसे कोई बुजुर्ग टॉफी या चाकलेट लेने की जिद के कारण पिटे हुए बच्चे का गाल सहलाकर उसे चुप कराने की कोशिश करता है, फिर बोले, ‘हॉफ गर्लफ्रेंड’ के चक्कर में बीवी से पिट गया, यार! मेरी बीवी भी न…एकदम अकल से पैदल है। अकल के पीछे लट्ठ लिए घूमती रहती है। सारी दुनिया बदल गई। अपना देश बदल रहा है। इंडिया से न्यू इंडिया, डिजिटल इंडिया, और न जाने कैसे-कैसे इंडिया हो रहा है। देश के युवा फुल गर्लफ्रेंड, हॉफ गर्लफ्रेंड, क्वार्टर गर्लफ्रेंड की अवधारणा को बहुत पीछे छोड़कर माइक्रो और मिनी गर्लफ्रेंड/ब्वायफ्रेंड तक आ गए हैं। लेकिन वह कमबख्त अभी तक करवाचौथ, पतिव्रता, पत्नीव्रता जैसी वाहियात बातों में उलझी हुई है।’
मैंने मुसद्दी लाल से कहा, ‘आप बातों की जलेबी तलने की बजाय साफ-साफ बताइए कि मामला क्या है? यह लाल बुझक्कड़ों की तरह पहेलियां बुझाना बंद कीजिए, समझे आप। वैसे एक बात बताऊं। इस बुढ़ापे में भी आप छबीली से नैनमटक्का करने से बाज नहीं आते हैं। यह मैं कई बार देख चुका हूं।’ मेरी बात सुनकर मुसद्दी लाल सिटपिटा गए। फिर गला खंखारकर बोले, ‘बात दरअसल यह है कि कल शाम को सब्जी खरीदते समय छबीली से मुलाकात हो गई थी। पता नहीं, मुझ पर क्या खब्त सवार हुई। मैं उससे बतियाने लगा। बात करते-करते हम दोनों सड़क के किनारे उगे पीपल के पेड़ के नीचे खड़े हो गए। वह मेरी पत्नी को दीदी कहती है, इसलिए मैंने साली समझकर इतना कहा था कि तुम मेरी हॉफ गर्लफ्रेंड बनोगी? मेरे प्रस्ताव को सुनकर वह नासपीटी हंस पड़ी। उसके लजाने, शरमाने और दांतों तले अंगुली दबाने को मैंने उसकी सहमति समझकर हाथ पकड़ लिया। इस पर भी उसने आपत्ति नहीं जताई। थोड़ी बहुत रसीली बातों के बाद हमने सब्जी खरीदी और घर आ गए। इस बीच छबीली ने आकर तुम्हारी भाभी को हॉफ गर्लफ्रेंड वाली बात बता दी। इसके अलावा क्या-क्या बताया राम जाने।’
इतना कहकर मुसद्दी लाल बोले, ‘तभी से बीवी ने पांचजन्य फूंक रखा है। घर कुरुक्षेत्र बना हुआ है। हम दोनों कौरव-पांडवों की तरह युद्धरत हैं। मेरे क्षत-विक्षत अंग देख रहे हो, यह सब छबीली को हॉफ गर्लफ्रेंड बनने का प्रस्ताव देने का नतीजा है।’ इतना कहकर मुसद्दी लाल कराहने लगे, मैं उन्हें निरीह भाव से देखता रहा।

Tuesday, May 23, 2017

बीवी-बॉस के चक्कर में घनचक्कर पुरुष

अशोक मिश्र
स्त्री जीवन भर तीन ‘प’ यानि पिता, पति और पुत्र नामक रिश्ते से मु
क्त नहीं हो पाती। इनमें से एक न एक ‘प’ का दखल उसके जीवन में हमेशा बना ही रहा है। काल भले ही कोई रहा हो। सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग या वर्तमान कलयुग। चलिए थोड़ी देर के लिए मान लिया कि किसी स्त्री ने शादी नहीं की। शादी नहीं की, तो दो ‘प’ यानि पति और पुत्र की गुंजाइश ही नहीं रही। मान लिया कि शादी की भी और उसने किसी पुत्र को जन्म नहीं दिया। फिर भी पिता और पति रूपी ‘प’ तो मौजूद ही रहे न उसके जीवन में। अब यह मत कहिएगा कि पिता के बिना भी किसी स्त्री या पुरुष का जीवन हो सकता है। हां, कई बार ऐसा होता है कि किसी स्त्री को अपने पिता के बारे में ज्ञात न हो, लेकिन पिता का अस्तित्व ही न हो, ऐसा कहीं हो सकता है? स्त्री के पास दो ‘प’ यानी पति और पुत्र से मुक्त रहने का विकल्प हमेशा रहा है। यह भी सच है कि सौ में से निन्नान्वे स्त्रियां सज्ञान होते ही पति और पुत्र की कामना से तीरथ, व्रत में रत हो जाती हैं।
अब पुरुष की नियति देखिए। वह भी जीवन भर स्त्रियों की तरह दो ‘ब’ यानी बीवी और बॉस से मुक्त नहीं हो पाता है। स्त्रियों की तरह वह भी जवान होते ही एक ‘ब’ यानि बीवी के ख्वाब देखने लगता है। कंचे, गुल्ली-डंडा, ताश आदि खेलने की उम्र में वह बेचारा अपने वजन से दो गुना ज्यादा भारी बस्ता पीठ पर लादकर इस कामना के साथ स्कूल जाता है कि बड़े होकर एक अदद अच्छी बीवी और एक सहृदय बॉस मिलेगा। बचपन से ही उसके दिमाग में यह बात ठूंस-ठूंसकर बैठा दी जाती है कि बेटा! अगर अच्छी तरह से पढ़ाई-लिखाई नहीं की, तो जीवन में अच्छी बीवी और अच्छे बॉस को तरस जाओगे। यही समीकरण स्त्रियों पर भी लागू होता है। अच्छा पति और बॉस चाहिए, तो सारी किताबें घोंट जाओ, अच्छे नंबर लाओ। ज्ञानी बनो या भाड़ में जाओ, लेकिन मार्कशीट में नंबर कम नहीं दिखाने चाहिए।
भाग्य की विडंबना देखिए। पुरुष इन दोनों अर्थात बीवी और बॉस को प्रसन्न करने के चक्कर में जीवन भर घनचक्कर बना रहता है। पति या कर्मचारी के हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी बीवी या बॉस खुश हुए हों, ऐसा कोई उदाहरण हाल-फिलहाल में नहीं दिखाई देता है। आप किसी भी बॉस से बात करके देखिए, वह अपने अधीनस्थों के काम-काज से कभी खुश नहीं दिखाई देगा। एक अजीब सी खिन्नता उसके चेहरे पर विराजमान रहती है। कितना भी कमाइए, घर भर दीजिए, लेकिन बीवी को हमेशा लगता है कि उसका पति दुनिया का सबसे बड़ा निखट्टू है। कार्ल मार्क्स का द्वंद्वात्मकता का सिद्धांत यहां पूरी तरह लागू होता है। बीवी और बॉस का अस्तित्व तभी तक है, जब तक पति और अधीनस्थ का अस्तित्व है। यही तर्क स्त्री और पुरुष के संदर्भ में दिया जा सकता है। स्त्री को पुरुष बिना चैन नहीं और पुरुष तो स्त्री के लिए हर युग में जन्मजाती तौर बेचैन रहा है।

Tuesday, May 9, 2017

‘लालबत्ती’ ने ‘हूटर’ को दिया जन्म


अशोक मिश्र
जब देश आजाद हुआ और पहली सरकार बनी, तब सबसे विकट समस्या यह थी कि इस मुई ‘लालबत्ती’ का क्या किया जाए? ‘लालबत्ती’ का जन्म तो अंग्रेजों के समय में ही हो गया था, लेकिन तब उसके आशिक सिर्फ अंग्रेज ही हुआ करते थे। हां, भारतीय लोग बस दूर से ही ‘लालबत्ती’ के नित्य निखरते सौंदर्य को देखकर ललचाते और हाथ मलकर रह जाते। आजादी के बाद जैसे-जैसे ‘लालबत्ती’ का रूप-यौवन दिन दूना रात चौगुना बढ़ता जा रहा था, उसके आशिकों की तादात भी बढ़ती जा रही थी। ‘लालबत्ती’ के आशिक कहीं गृहयुद्ध पर आमादा न हो जाएं, यही सोचकर ‘लालबत्ती’ का विवाह इस शर्त के साथ राजनीति से करा दिया गया कि जब तक सत्ता सुंदरी तुम पर मेहरबान है, तभी तक तुम इस ‘लालबत्ती’ का मनचाहा उपभोग करने के अधिकारी हो। खबरदार, तुम इसके आजीवन उपभोग की उम्मीद कतई न करना और न ही कभी ‘लालबत्ती’ उम्मीद से होने पाए।
लेकिन शायद यह नियति को मंजूर नहीं था या ‘लालबत्ती’ के किसी आशिक की करतूत कि राजनीति और ‘लालबत्ती’ के वैवाहिक जीवन के 67 साल बाद ‘लालबत्ती’ उम्मीद से हो गई। ‘लालबत्ती’ के उम्मीद से होने की खबर फैलते ही आशिकों के दिल बैठ गए। कुछ आशिक तो गश खाकर पड़े। होश आया, तो लगा छाती पीटने। सदमाग्रस्त आशिक लगे अवांट-बंवाट बकने। कुछ के मुंह से बकते-बकते झाग भी निकलने लगा। ‘लालबत्ती’ के कुछ चतुर आशिकों ने अपने थोबड़े का भूगोल सुधारा। मुंह पर ठंडे पानी का छींटा मारा, क्रीम-पॉवडर लीपने-पोतने के बाद चार बार बचे-खुचे बालों पर कंघी फेरा और टीवी चैनल्स पर चलने वाली डिबेट्स में भाग लेने आ गए, ‘अच्छा हुआ, ‘लालबत्ती’ से पीछा छूटा। 67 साल की बुढ़िया से मोहभंग होने लगा था। अब कम से कम बिना किसी मोहग्रस्तता के जनसेवा तो कर सकूंगा। ‘लालबत्ती’ के चलते में गरीब, असहाय जनता की सेवा से वंचित था। अच्छा हुआ, मुई ‘लालबत्ती’ से पिंड छूटा।’
‘लालबत्ती’ की काफी गहन जांच पड़ताल के बाद प्रधान दाई ने घोषणा की कि ‘लालबत्ती’ पूरे दिन से है, एक मई तक कुछ हो सकता है। उन्होंने यह संभावना व्यक्त की कि ‘लालबत्ती’ की गर्भकाल में यदि ठीक-ठाक देखभाल की जाए, तो यह स्वस्थ ‘ईपीआई’ कल्चर को जन्म दे सकती है। पूरा देश दिल थामकर ‘लालबत्ती’ के प्रसव का इंतजार करने लगा।
आखिर एक मई का वह बहुप्रतीक्षित दिन आ पहुंचा। पूरे देश की निगाह ‘लालबत्ती’ पर लगी हुई थी। सभी ‘ईपीआई’ का जन्मोत्सव मनाने की तैयारी में जुट गए। कुछ तो बाकायदा गोला-बारूद से लैस हो गए। समय पर ‘लालबत्ती’ के प्रसव पीड़ा शुरू हुई। उसे अस्पताल लाया गया। पूरे चौबीस घंटे की मेहनत के बाद लेबर रूम से डॉक्टर निकली और उदास स्वर में घोषणा की, ‘लालबत्ती’ ने सीजेरियन ऑपरेशन से ‘हूटर’ को जन्म दिया है।’ यह सुनते ही लालबत्ती के आशिकों के चेहरे खिल उठे। वह समझ गए कि लालबत्ती भले ही बेवफा हो गई हो, लेकिन अब हूटर का उपयोग करके भौकाल कायम रखा जा सकता है। ‘लालबत्ती’ नहीं, न सही। हूटर तो है कम से कम भौकाल टाइट रखने को।

Tuesday, May 2, 2017

गधे तो वाकई गधे होते हैं

अशोक मिश्र
गधे तो वाकई गधे होते हैं। एकदम सीधे-सादे, मेहनती और संतोषी। गधे के यही तीन गुण उसको महान बना देते हैं। सीधा इतना कि मालिक बात-बेबात दो लट्ठ लगा भी दे, तो बिलबिलाकर ‘ढेंचू-ढेंच’ कर लेगा और फिर निरपेक्ष भाव से काम में लग जाएगा या चरने लगेगा। मेहनत के बारे में तो कहना ही क्या। इंसान को उसकी औकात से थोड़ा ज्यादा काम बता दो, तो तत्काल कह बैठता है, ‘गधा समझ लिया है क्या? कि लाद दिया एक गधे भर का काम।’ कहने का भाव यह है कि गधे जितना काम कोई कर ही नहीं सकता। संतोष के मामले में इस चराचर जगत में गधे का मुकाबला कोई जीव कर ही नहीं सकता है, न एक कोशिकीय, न बहुकोशिकीय। सिधाई, मेहनत और संतोष मिलकर किसी गधे को गधा बना देते हैं, उसे गधत्व (गधापन) प्रदान करते हैं। जिस तरह संतत्व, बुद्धत्व, वीरत्व एक भाव है, एक विशेषण है, ठीक उसी तरह गधत्व भी एक खास किस्म की प्रवृत्ति का बोध कराता है। यह अमूर्त होते हुए भी प्राचीनकाल से ही इंसानों में भी मूर्तमान होता रहा है।
यह गधत्व ही है जिसकी बदौलत आप किसी भी व्यक्ति को देखते ही कह देते हैं, ‘अरे! यह तो पूरा गधा है।’ अब आप चीनियों की बुद्धिमत्ता देखिए। वे पाकिस्तान से गधे आयात करने जा रहे हैं। मानो पूरी दुनिया में पाकिस्तानी गधे और उनका गधत्व ही उच्चकोटि का है। अब चीनियों को कौन समझाए कि पाकिस्तान से गधों का आयात करके ही वे उच्चकोटि के गधत्व को प्रदर्शित कर रहे हैं। मेरे एक पाकिस्तानी मित्र हैं ‘कमरटुट्ट’। एक बार किसी बात पर खफा होकर उनकी बेगम ने उनकी कमर पर पाद प्रहार किया था, जिससे कमर में लचक आ गई। बस तभी से उनका नाम कमरटुट्ट पड़ गया। लोग उनका असली नाम ही भूल गए। टेलीपैथी (मानसिक तरंगों) से हम रोज बातचीत जरूर करते हैं। एक दिन ‘चीन द्वारा पाकिस्तानी गधों के आयात’पर बातचीत होने लगी, तो उन्होंने बड़े गर्व से बताया, ‘जानते हैं, एशिया महाद्वीप में पाकिस्तानी गधे हमेशा से ही उच्चकोटि के रहे हैं।
पाकिस्तान में चाहे लोकतांत्रिक सरकार रही हो या सेना की तानाशाही वाली, सबने गधों को संरक्षण प्रदान किया है। पूरी दुनिया में सबसे शुद्ध गधत्व पाकिस्तान का ही रहा है। हमारे यहां एक से बढ़कर एक गधे हुए हैं जिनके गधत्व की पूरी दुनिया में धूम रही है। कई बार तो अमेरिका, रूस, चीन, जापान से लेकर होनोलूलू द्वीप समूह तक के नागरिक हमारे देश के गधों का गधत्व देखकर आश्चर्यचकित रह गए हैं। यही वजह है कि चीन मुंहमांगी कीमत पर हमारे गधों का आयात कर रहा है। वैसे गुणवत्ता में पाकिस्तानी खच्चर भी किसी से कम नहीं हैं, लेकिन जितनी ख्याति पाकिस्तानी गधों की रही है, वैसी ख्याति खच्चरों को नहीं मिल पाई। या कहिए कि पाकिस्तानी खच्चरों की ब्रांडिंग ठीक से नहीं की गई। अगर ब्रांडिंग हुई होती, तो पाकिस्तानी खच्चरों का निर्यात करके पाक अमीर हो गया होता।’ अब कमरटुट्ट की बात पर मैं बोलूं भी तो क्या बोलूं? आप लोग ही बताएं।

फिर गए हवाई चप्पलों के दिन

-अशोक मिश्र
ठीक उसी तरह ‘कि पहले अंडा आया कि मुर्गी’ की तरह यह सवाल भी मौजू है कि पहले जूते आए या चप्पल। जूते का ही संशोधित रूप चप्पल है या चप्पल की ही अगली पीढ़ी का नुमाइंदा है जूता। मेरा ख्याल है कि ऊंचे-नीचे, पथरीले-रेतीले रास्तों पर चलने से होने वाली दिक्कत से बचने के लिए आदमी ने सबसे पहले जिस चीज की कल्पना की होगी, वह खड़ाऊं ही रही होगी। अब तक सबसे ज्यादा प्रसिद्ध खड़ाऊं रामचंद्र जी की ही रही है, जिसे उनके छोटे भाई भरत ने सिंहासन पर रखकर अमर कर दिया। खड़ाऊं का ही संशोधित रूप चप्पल है, इसे मानने में शायद ही किसी को आपत्ति हो। खड़ाऊं पहनकर चलने-भागने में होने वाली दिक्कतों ने चप्पल का ईजाद किया। हां, आजादी के कई दशक पहले से लेकर आजादी के बाद के दो-ढाई दशक तक पूरे देश में गटापारची (प्लास्टिक) चप्पलों का राज रहा है, लेकिन जैसे ही रबड़ की चप्पलें बाजार में आईं, गटापारची चप्पलों का पराभव हो गया। ठीक वैसे ही जैसे दिलीप कुमार, राजेंद्र कुमार और मनोज कुमार का स्टारडम राजेश खन्ना के आते ही क्षीण हो गया था।
हवाई चप्पल भी बहुत दिनों तक लोगों के दिलों पर राज नहीं कर सकी। किसिम-किसिम की सैंडिलों और जूते-जूतियों ने हवाई चप्पलों को उनकी औकात बता दी। जिस गटापारची या हवाई चप्पलों को पहनकर लोग शादी-विवाह, नाते-रिश्तेदारी में आते-जाते थे, उसको पहनकर घर से बाहर निकलना, हास्यास्पद हो गया। गटापारची चप्पल तो जहां बिला गए, वहीं हवाई चप्पलों का दायरा घर तक ही सीमित कर दिया गया।
कहते हैं न कि बारह साल बाद घूरे के भी दिन फिर जाते हैं। हवाई चप्पलों के भी दिन फिर गए हैं। कल तक बड़े-बड़े शापिंग मॉल्स, बड़े-बड़े शूज स्टोर्स से लेकर गांव-कस्बों में खुली ‘मटुकनाथ जूता स्टोर’ टाइप दुकानों में इतराने वाले ब्रांडेड जूते-चप्पल अपनी किस्मत को रो रहे हैं। उन्हें कोई पूछ ही नहीं रहा है। मानो हवाई चप्पलों के सामने उनकी कोई औकात ही न बची हो। हवाई चप्पल खरीदने को भीड़ उमड़ी पड़ रही है। भले ही अभी हवाई यात्रा का जुगाड़ न हो पाया हो, लेकिन निरहू प्रसाद से लेकर कल्लो भटियारिन तक हवाई चप्पल खरीद कर रख लेना चाहते हैं। क्या पता किस दिन हवाई यात्रा का कोई जुगाड़ भिड़ ही जाए। ऐन मौके पर हवाई चप्पल न मिले, तब? नासपीटा घुरहुआ उस दिन दुकान बंद रखे, तो क्या होगा? हवाई यात्रा का सपना तो ‘टांय-टांय फिस्स’ हो जाएगा। आज हवाई चप्पल पहनकर हवाई यात्रा करने की इजाजत मिली है, कल हवाई यात्रा के लिए हवाई चप्पल अनिवार्य कर दिया गया, तो? सरकार कुछ भी कर सकती है। सरकार सरकार है। उसका कोई हाथ पकड़ सकता है भला। गरीब नवाज तो कल यह भी कह सकते हैं कि चड्ढी-बनियान पहनकर भी लोग हवाई यात्रा कर सकते हैं, बस चड्ढी-बनियान फटी न हो। दुकानदार भी मौके की नजाकत देखकर हवाई चप्पल की कालाबाजारी कर रहे हैं। साठ-सत्तर रुपल्ली में बिकने वाली हवाई चप्पल आकाश कुसुम होती जा रही है। अभी कल ही एक खबर छपी थी कि जूते की दुकान का ताला तोड़कर चोर पचास जोड़ी हवाई चप्पल चुरा ले गए। ब्रांडेड और लक्जरियस जूते, सैंडिल्स चोर से हाथ जोड़कर विनती करते रहे, लेकिन चोर ने उनकी एक नहीं सुनी।

Tuesday, April 25, 2017

स्वर्ग जैसे ‘न्यू इंडिया’ में नंगे-अधनंगे किसान

अशोक मिश्र
हमारे देश के मजदूर-किसान भी न..एकदम बौड़म हैं बौड़म। धेले भर की अकल नहीं और अकल के पीछे लट्ठ लिए बेतहाशा भागे चले जा रहे हैं। किसानों को गुमान है कि वे देश के अन्नदाता हैं। मजदूरों को वहम है कि वे भाग्यविधाता हैं। अरे! वह दिन गए, जब किसान अन्नदाता और मजदूर भाग्य विधाता हुआ करता था। अब तो सारा देश भारत से ‘इंडिया’ और अब ‘इंडिया’ से ‘न्यू इंडिया’ होने जा रहा है। पूरी दुनिया आश्चर्य चकित होकर इस ‘न्यू इंडिया’ का चमकता ग्लोसाइन देख रही है। वाह..वाह कर रही है। दुनिया भर के बड़े-बड़े कारपोरेट घराने भारी-भरकम थैलियां लेकर दौड़े चले आ रहे हैं। उन्हें विश्वास है कि अगर कहीं बाजार है, सस्ता श्रम है, लूट-खसोट में सहायक होने वाले लेबर लॉ हैं, शोषण-दोहन की अपार संभावनाएं हैं, अनपढ़ और लतखोर मजदूर-किसान हैं, तो वह ‘न्यू इंडिया’ में ही हैं। ‘न्यू इंडिया’ तो जैसे कारपोरेट व्यापारियों का स्वर्ग है। न्यू इंडिया का चमकता चेहरा देखकर हमारे राजनीतिक भाग्य विधाता आत्ममुग्ध हैं, ठीक वैसे ही जैसे किसी फाइव स्टार होटल में आयोजित फैशन शो के दौरान अपनी नग्न-अर्धनग्न चिकनी काया पर पड़ती कैमरों की लाइट्स देखकर मॉडल्स भावविभोर होती हैं। इन आत्ममुग्ध और भावविभोर मॉडल्स को उस क्षण तो यही लगता है कि उनकी कंचनी काया और कैमरों की फ्लैश लाइट्स ही शाश्वत सत्य है, बाकी सब मिथ्या है।
ऐसी चमक-दमक वाली ‘न्यू इंडिया’ में हमारे देश के किसानों को देखिए, सुपरसोनिक विमानों की रेस में अपनी बैलगाड़ी दौड़ाए चले जा रहे हैं। ये किसान समझ क्यों नहीं पा रहे हैं कि मुंशी प्रेमचंद का युग बीत चुका है। ‘होरी’ और ‘धनिया’ रहे होंगे कभी किसानों के रोल मॉडल, लेकिन ‘न्यू इंडिया’ के आईकॉन बड़े-बड़े कारपोरेट घराने हैं, अबानी हैं, अडानी हैं, विजय माल्या हैं। अब ‘होरी’ और ‘धनिया’ होने के कोई मायने नहीं है। अब तो धरना-प्रदर्शन करने, ‘इंकलाब जिंदाबाद’ या ‘फलाने-ढिमकाने मुर्दाबाद’ के नारे लगाने के दिन हवा हो गए। न्यू इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टैंडअप इंडिया, सिटडाउन इंडिया, धमकाऊ इंडिया, लतियाऊ इंडिया का जमाना है। जंतर-मंतर पर पैंतीस-चालीस दिन तक धरना देने और गू-मूत खाने-पीने वाले किसान अगर अपने साथियों के नरमुंडों के साथ बस एक प्यारी सी सेल्फी लेते और फेसबुक, ह्वाट्सएप, ट्विटर, इंस्टाग्राम पर डाल देते, तो फिर देखते तमाशा। कम से कम दस-बीस हजार लाइक्स मिलते, चार-पांच हजार कमेंट्स मिलते ही मिलते। ठेंगा, स्माइलिंग फेस जैसे इमोजीज की तो बात ही छोड़ दीजिए। दो-तीन हजार ठेलुए टाइप के फेसबुकिये उसे शेयर करते ही करते। फिर क्या..फिर तो पूरी दुनिया में तलहलका मच जाता। डिजिटल वर्ल्ड में एक रक्तहीन क्रांति हो जाती। सरकार को झुकना पड़ता, नहीं तो फेसबुकिये, ह्वट्सएपिये, इंस्टाग्रामिये, ट्विटरिस्टवे इतना हंगामा खड़ा कर देते। किसानों की वह पोस्ट इतनी वायरल होती कि आभासी दुनिया में तहलका मच जाता। केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक की इतनी छीछालेदर और ‘थू-थू’ होती कि वह मारे शर्म के किसानों के सारे ऋण माफ कर देती। अब अगर मजदूर-किसान इक्कीसवीं सदी में पांचवीं सदी की लड़ाई का तरीका अख्तियार करेंगे, तो लोग और सरकार घंटा ध्यान देंगे।

Sunday, April 23, 2017

एक पोस्ट कीन्हें बिना

अशोक मिश्र
इस देश में कभी हुआ करता था त्रेतायुग। अरे सतयुग के बाद आने वाला त्रेतायुग। उस त्रेतायुग में पैदा हुए थे शंकर सुवन केशरी नंदन। इस देवात्मा को हनुमान जी भी कहा जाता है। हनुमान जी ने अपनी आधी जिंदगी कैसे भी व्यतीत की हो, लेकिन जबसे उनका परिचय रामचंद्र जी से हुआ, तब से उन्हें बस एक ही धुन सवार थी- रामकाज कीन्हें बिना मोहि कहां विश्राम। करणीय, अकरणीय, लभ्य, अलभ्य जो कुछ भी था, वह सब कुछ रामकाज ही था। सीता की खोज में जाते समय मैनाक पर्वत ने जब वानर शिरोमणि हनुमान से विश्राम करने को कहा, तो उन्होंने विनयपूर्वक मैनाक के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उन्हें तो बस एक ही धुन थी किसी भी प्रकार हो, रामकाज करना है। यह धुन ही थी जिसने उन्हें रामचंद्र का सखा, भक्त, भाई, सचिव सब कुछ बना दिया था। उनके सखा भाव, भक्तिभाव को देखकर बाद में जनकनंदिनी भी कुछ हद तक ईष्यालु हो उठी थीं। भारतीय नारी कैसे सहन कर सकती है कि कोई उसके पति के प्रति उससे भी ज्यादा साख्यभाव रखे, भक्तिभाव रखे। वे अतुलित बलधारी होते हुए रामचंद्र के प्रति विनीत थे। वे भगवान थे, महावीर थे। उनकी लीला और महिमा अपरंपार थी। उनकी किसी से तुलना भी नहीं हो सकती है।
वह त्रेतायुग था, लेकिन यह कलियुग है। उस युग में अंजनि पुत्र महावीर थे, तो इस युग में फेसबुकवीर हैं। त्रेतायुग में भक्तिभाव का हनुमान जी बढ़कर दूसरा कोई उदाहरण खोजने पर भी नहीं मिलता, लेकिन कलियुग में फेसबुक के प्रति अनन्य भक्तिभाव लिए कोटि-कोटि फेसबुकवीर हैं, फेसबुक वीरांगनाएं हैं। इन वीरों और वीरांगनाओं की बस एक ही धुन है-‘एक पोस्ट कीन्हें बिना मोहि।’ इनकी भी भक्ति भाव, सखा भाव अप्रतिम है। ये फेसबुक की आभासी दुनिया में स्वच्छंद विचरण करते हैं, निशि-वासर, प्रात:काल, संध्याकाल, जैसे समय इनके स्वच्छंद विचरण के लिए कोई मायने नहीं रखते हैं। फेसबुक वीर और वीरांगनाएं रक्तसंबंधों, सामाजिक संबंधों को आभासी दुनिया के स्वच्छंद विचरण में बाधक मानकर उसी तरह विरक्त रहते हैं, जैसे कि कोई उच्च कोटि का साधक मोह, माया, काम, क्रोध से विरक्त रहकर परमानंद की खोज में लगा रहता है। फेसबुक वीर-वीरांगनाएं काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसे विकारों से विरक्त होकर बस एक पोस्ट की खोज में लगे रहते हैं। आभासी दुनिया में जहां कहीं मनोवांछित पोस्ट मिली या अपनी चौर्यकला की बदौलत किसी अन्य की मौलिक रचना को हस्तगत किया और स्वरचना प्रदर्शित करते हुए अपने फेसबुक पर पोस्ट की या प्रातिभ प्रदर्शन कर सर्जना करके पोस्ट की, तो उन्हें वैसे ही परमानंद की अनुभूति होती है, जैसे किसी साधक को लक्ष्य प्राप्त होने पर होती होगी। इन वीर-वीरांगनाओं के बाल-बच्चे, माता-पिता, पति-पत्नी और अन्य सांसारिक नाते-रिश्तेदार इनके फेसबुक प्रेम के प्रति ईर्ष्याभाव रखते हैं। फेसबुक वीरों को फेसबुकीय जगत में एक नायिका की तलाश चिरंतन काल से रही है। नायिका भेद से इन्हें रंचमात्र मतलब नहीं होता है। लुभावना चित्र देखते ही ‘इनबाक्स’ में पैठकर रसानुभूति करने लगते हैं। हां, आभासी दुनिया में वीरांगनाएं किस हेतु-अहेतु के लिए विचरती हैं, इस पर अभी अनुसंधान जारी है।

Tuesday, April 11, 2017

ज्यादा अंगरेजी न बूको, समझे

अशोक मिश्र
राजमार्ग से थोड़ा हटकर खुले मदिरालय प्रांगण में परम विपरीत विचारधारा वाले दल के कर्मठ कार्यकर्ता मिले। दोनों परम मद्यप थे, परंतु पूर्व परिचित भी। दोनों ने एक दूसरे पर इतनी तीव्रता से दृष्टिपात किया कि एक बार लगा, दोनों के चक्षु अपने-अपने कोटरों से बाहर गिर पड़ेंगे। फिर एक ने दूसरे का पाणिग्रहण कर काष्ठासन (बेंच) पर बिठाते हुए कहा, ‘भ्रात! यह सत्य है कि तुम्हारे दल के विचारों से हमारा दल रंचमात्र सहमत नहीं है, किंतु मदिरालय में क्या दल और क्या दलदल, क्या मत और क्या मतांतर, सब निरर्थक हैं। अत: हे भ्रातृश्रेष्ठ! आओ, हम सकल मतभेद का परित्याग कर प्रसन्न मन से मदिरापान करें।’
दूसरे दल के कार्यकर्ता के अधरों पर स्मित हास्य प्रस्फुटित होने लगा। उसने मदिरा विक्रेता को आसव पेश करने का संकेत किया। तीन-तीन चषक मदिरापान के बाद दोनों मद्यप मुखर हो उठे। एक मद्यप ने चषक उठाकर लंबा घूंट भरा और मुंह बिचकाते हुए कहा, ‘भ्राताश्री! आपको तो यह ज्ञात ही होगा कि आदिकाल से लेकर पांच सदी पूर्व तक भारत की विश्व में प्रतिष्ठा जगत्गुरु की रही है। ज्ञान गुरु होने का मूल कारण भारतीय पुरुषों का सुर होना रहा है। सुर अर्थात वे लोग जो सुरापान करते थे और असुर अर्थात वे लोग जो सुरापान नहीं करते थे। उस समय सुरापान करके जो व्यक्ति सुर में गायन करते थे, वे ही कालांतर ससुर कहे गए। जो थोड़ा भद्दा गाते थे, वे भसुर कहे जाते थे। लेकिन इन मूढ़मति भाषा विज्ञानियों को क्या कहूं, इन्होंने ससुर और भसुर का अर्थ ही अनुलोम-विलोम जैसा कर दिया। असुरों में लंपट, लबार, चोर, कामी बहुतायत में पाए जाते थे। किंतु सुरापान करने वालों में ऐसी प्रवृत्तियां रंचमात्र नहीं पाई जाती थीं।’
इतना कहकर संभाषण करने वाले मद्यप ने अपना चषक उठाकर सारी सुरा उदरस्थ की और फिर बोला, ‘भगवत्कृपा से अब फिर से हम अपनी पुरातन संस्कृति की ओर लौट रहे हैं। शराब या वाइन शॉपों के कायांतरण की प्रक्रिया बस शुरू होने वाली है। इनके नाम सुरालय, मदिरालय या मद्यशाला रखने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।’ 
यह सुनते ही दूसरे वाले ने पहले तो चषक के कंठ तक मदिरा भरी, फिर उदरस्थ किया और फिर आवेश में रिक्त चषक को भूमि पर पटकते हुए कहा, ‘तेरी तो..यह जो संस्कृत निष्ठ भाषा छांट रहा है, वह बंद कर और शुद्ध हिंदी में सुन। सरकार बन गई है न! चुपचाप शासन कर। आज तेरी सरकार एंटी रोमियो स्क्वायड बना रही है, भ्रष्टाचार की जांच कर रही है, करे। शौक से करे। कौन सा सौ-दो सौ साल तक तुम्हारी पार्टी राज करेगी। कहा भी गया है कि कभी नाव पानी पर, कभी पानी नाव पर। आज तुम्हारी सरकार है, कल हमारी थी। हो सकता है, परसों, नरसों, तरसों हमारी सरकार बने या न भी बने। कोई दूसरा शासन करे, तब..? तब तुम भी हमारी तरह भीगी बिल्ली बने ‘म्याउं..म्याउं’ कर रहे होगे। इसलिए ज्यादा अंगरेजी न बूको। समझे।’ इतना कहकर वह मद्यप उठा, मदिरा विक्रेता को पैसे दिए बिना अपने गंतव्य की ओर चला गया।